जानें नैचुरल डिलिवरी के बारे में

Tuesday, February 14th, 2012

नैचुरल डिलिवरी

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नैचुरल डिलिवरीजानें नैचुरल डिलिवरी के बारे में–प्रसव एक ऐसी स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से गर्भाशय में पूर्णत: पला शिशु स्वत: ही योनि मार्ग से बाहर आता है ।प्रसव से पूर्व वह गर्भाशय में ही फलता –फूलता रहता है जबकि प्रसवोपरांत पृथ्वी पर उसके जीवन की शुरूआत होती है।ऐसा देखागया है कि शिशु को गर्भाशय से बाहर निकालने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व गर्भाशय के उपर ही निर्भर रहता है।प्रसव के समय गर्भाशय  की पेशियां एक विशेष गति

से संकुचित और फैलने की क्रिया शुरू कर देती है।इस क्रम में संकुचित पेशियां शिशु पर पीछे से एक दबाव डालने लगती है तथा उसे बाहर निकलने के लिए विवश कर देती है।

यह कुदरत की सबसे रहस्यमय और अदभुत प्रक्रिया ही कही जा सकती है कि एक तरफ जहाँ  गर्भस्थ शिशु पूरे नौ महीने तक माँ के शरीर में ही छिपा रहता है वहीं अचानक एक दिन बाहर आने के लिए कड़ी मशक्कत करने लगता है।स्त्रियों में प्रसव की यह सम्पूर्ण प्रक्रिया तीन चरणों में जाकर संपन्न होती है।

प्रसव प्रक्रिया के सबसे पहले चरण में गर्भाशय़ के उपरी भाग की पेशियों में प्रत्येक पाँच मिनट  के अंतराल से पीड़ायुक्त संकुचन की लहरें सी उठने लग जाती है।इनके कारण गर्भाशय मुख की सभी नसों पर दबाव पडने लगता है और परिणामतय:गर्भाशय का मुख श्रोणी से बाहर आकर योनि में खुलने लगता है।गर्भाशय का मुख इस प्रथम चरण में तीन सेटी.मीटर के करीब खुल जाता है।इसके कुछ समय बाद गर्भाशय की पेशियों में संकुचन की लहरें प्रत्येक तीन मिनट के अंतराल से आने जाने लगती हैं और तब गर्भाशय का मुख छ:सें.मीटरके करीब खुल जाता है।इसके उपरांत धीरे धीरे गर्भाशय की संकुचन की गति और भी तीव्र होती जाती है तथा प्रत्येक दो-दो मिनट के अंतर से संकुचन की तरंगें आने जाने लगती है और तब गर्भाशय का मुख छ:सें.मीटर के करीब खुल जाता है।इसके उपरांत धीरे-धीरे गर्भाशय पर दबाव अत्याधिक बढ़ जाता है साथ ही इस अवस्था तक गर्भाशय का मुख भी पूरी तरह से खुल चुका होता है।इसी समय गर्भस्थ शिशु का सिर भी पहली बार गर्भाशय के मुख से बाहर झांकना शुरू कर देता है।

द्वितीय चरण

इस प्रथम चरण की संपूर्ण प्रक्रिया के कुछ समय बाद प्रसव प्रक्रिया के द्वितीय चरण की शुरूआत होती है।इस चरण में गर्भाशय का संकुचन कुछ भिन्न तरह से होने लगता है।इस चरण में शिशु बाहर की ओर आने की बजाए पीछे की ओर वापिस लौटने का दबाव बनाने लगता है।इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप गर्भाशय में और भी तीव्रता के साथ संकुचन की क्रिया होने लग जाती है,जो शिशु पर पीछे से और भी तीव्र प्रति दबाव बनाने लगता है जिसके फलस्वरूप अंतत:शिशु गर्भाशय से पूरे का पूरा बाहर निकल आता है।इस तरह प्रसव की एक अति महत्वपूर्णप्रक्रिया संपन्न हो जाती है।शिशु को बाहर निकाल करने के बाद गर्भाशय भी अपनी पूर्व स्थिति में लौट आता है।

तीसरा चरण

शिशु के बाहर आने के पश्चात प्रसव प्रक्रिया का तीसरा चरण शुरू होता है।इस चरण में एक बार पुन: गर्भाशय की पेशियों में कुछ समय के अंतराल से संकुचन की तरंगें उठने लगती हैं। इस बार यह संकुचन गर्भाशय में रह गये आंवल को बाहर फेंकने के लिये शुरू होता है।इस चरण को पूर्ण होने में आधा,पौन से घंटे तक लग सकता है।आँवल के  गर्भाशय से बाहर निकलने पर ही तीसरा और अंतिम चरण संपन्न् हो पाता है।

यह तो हुई स्वाभाविक प्रक्रिया की बात,लेकिन अनेक बार प्रसव के दौरान ऐसी पेचीदगियाँ खड़ी हो जाती हैं जो प्रसूता की सामान्य प्रक्रिया में बाधा डालने लग जाती है।ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक प्रसव प्रक्रिया से गर्भास्थ शिशु बाहर नहीं आ पाता है ऐसी दशा में प्रसव की प्रक्रिया के लंबे खिंचते जाने के कारण प्रत्येक पल शिशु और माँ दोनों के लिये जोखिम बढ़ता जाता है।इस स्थिति में शिशु को बाहर निकालने के लिये ऑपरेशन के द्वारा गर्भवती स्त्री के पेट को चीरा लगाकर शिशु को बाहर निकालना पड़ता है।ऑपरेशन द्वारा संपन्न की जाने वाली प्रसव प्रक्रिया को ही सिजेरियन डिलिवरी का नाम दिया जाता है।

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